महाराणा प्रताप की जीवनी हिंदी में

महाराणा प्रताप की जीवनी हिंदी में : आज हम आपके लिए एक और वीर पुरुष की जीवनी लेकर आये है ऐसा वीर पुरुष जिसने जीवन में कभी मुगलों के सामने घुटने नहीं टेके और पूरा जीवन स्वाभिमान के साथ जिए आज हम आपको महाराणा प्रताप की जीवनी हिंदी में बताएँगे

महाराणा प्रताप की जीवनी

नाम : महाराणा प्रताप
जन्म : 9 मई 1540
जन्म स्थान : कुम्भलगढ़ दुर्ग
पिता का नाम : राणा उदय सिंह
माता का नाम : महाराणी जयवंता बाई
घोड़े का नाम : चेतक
हाथी का नाम : रामप्रसाद
महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक : 1 मार्च 1572
हल्दीघाटी का युद्ध : 21 जून 1576
दिवेर का युद्ध : अक्टूबर 1582
महाराणा प्रताप की मृत्यु : 19 जनवरी 1597 (57 वर्ष)

महाराणा प्रताप का बचपन

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ में हुआ था। इनके पिता का नाम महाराणा उदय सिंह तथा माता का नाम रानी जयवंता बाई था।

बचपन से ही  महाराणा प्रताप में लीडरशिप के गुण थे। वे खेल खेल में बच्चों को ग्रुप में बांट देते थे तथा उनके लीडर बन जाते थे।

 बचपन में ही महाराणा प्रताप में अस्त्र तथा शस्त्र की ट्रेनिंग ले ली थी। वे युद्ध कला में माहिर थे।

जगमाल महाराणा प्रताप का सौतेला भाई था।

महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक

महाराणा उदयसिंह की 28 फरवरी 1572 को मृत्यु हो गई। इसके बाद जगमाल को राजगद्दी पर बैठा दिया गया। लेकिन जालौर के अखयराज और ग्वालियर के रामसिंह ने इसका विरोध किया।

1 मार्च 1572 को गोगुंदा में महाराणा प्रताप को सर्वसम्मति से राज्य सिंहासन पर बैठाया गया। एक प्रकार से यह “राजमहलों की क्रांति” थी।

इस बात से जगमाल नाराज होकर बादशाह अकबर के पास चला गया। बादशाह अकबर ने उसे जहाजपुर का परगना जागीर में दे दिया।

जब महाराणा प्रताप गद्दी पर बैठे तब उनकी आयु 32 वर्ष हो चुकी थी। महाराणा प्रताप “कीका” के नाम से लोकप्रिय थे।

प्रताप का राज्याभिषेक समारोह कुंभलगढ़ में मनाया गया। तब महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक वे चित्तौड़ को मुगलों से स्वतंत्र नहीं करा लेंगे तब तक वे “ना तो थाली में रोटी खाएंगे और ना ही बिस्तर पर सोयेंगे”।

महाराणा प्रताप और अकबर

अकबर मेवाड़ को इसलिए जीतना चाहता था क्योंकि गुजरात के समुद्र तट पर अरब देश से जहाज में जो सामान आता था उस सामान को दिल्ली तक ले जाने के रास्ते में मेवाड़ पढ़ता था।

 मेवाड़ पर महाराणा प्रताप का शासन था। जिन्होंने अकबर की गुलामी स्वीकार नहीं की थी। इसलिए अकबर को अपना समान दिल्ली ले जाने में काफी समय लगता था क्योंकि उसे दूसरे रास्तों से सामान दिल्ली ले जाना पड़ता था।

अकबर मेवाड़ के बदले महाराणा प्रताप का आधा हिंदुस्तान देने को तैयार हो गया था लेकिन महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को नहीं छोड़ा।

अकबर के बहुत प्रयास करने के बाद भी महाराणा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। इसके बाद दोनों के मध्य हल्दीघाटी का युद्ध हुआ।

हल्दीघाटी का युद्ध

सभी प्रयास विफल हो जाने के बाद अकबर ने कुंवर मानसिंह के नेतृत्व में शाही सेना को महाराणा प्रताप पर आक्रमण करने हेतु 3 अप्रैल 1576 को अजमेर से रवाना किया।

हल्दीघाटी राजसमंद जिले के नाथद्वारा से 11 मील दक्षिण पश्चिम में गोगुंदा और खमनोर के बीच एक संकरा स्थान है यहां की मिट्टी हल्दी के समान पीली होने के कारण इसका नाम हल्दीघाटी पड़ा।

हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप तथा अकबर की सेनाओं के मध्य 21 जून 1576 को हल्दीघाटी नामक स्थान पर  हुआ था।

हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की सेना में 80,000 सैनिक थे, दूसरी तरफ महाराणा प्रताप की सेना में सिर्फ 15,000 सैनिक थे।

हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप घायल हो गए थे। प्रताप युद्ध क्षेत्र छोड़ने को तैयार नहीं थे लेकिन झाला बीदा ने प्रताप का स्थान लिया तथा महाराणा प्रताप को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया गया।

महाराणा प्रताप के युद्ध भूमि से हट जाने के कारण मेवाड़ की सेना की हिम्मत टूट गई जिस कारण महाराणा प्रताप की सेना हल्दीघाटी का युद्ध हार गई।

महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक और हाथी रामप्रसाद

 युद्ध में महाराणा प्रताप अपने घोड़े के सामने हाथी की सूंड लगा कर रखते थे जिस कारण हाथी घोड़े को भी हाथी समझ लेता था और चेतक उन पर हमला करके उन्हें घायल कर देता था।

 चेतक घोड़े का रंग आसमानी नीला था।

युद्ध के समय अकबर की सेना के एक हाथी की सूंड पर तलवार बंधी थी उस तलवार से चेतक घोड़े का एक पैर कट गया।

महाराणा प्रताप युद्ध हारने वाले थे चेतक घायल अवस्था में होते हुए भी अपने मालिक महाराणा प्रताप को युद्ध स्थल से दूर ले गया और घायल होते हुए भी रास्ते में एक 28 फीट लंबे नाले को छलांग लगाकर पार कर दिया और अपने के जीवन की रक्षा की नाले को पार करते ही चेतक ने अपने प्राण त्याग दिए।

 महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय हाथी का नाम “रामप्रसाद” था युद्ध के समय रामप्रसाद की सूंड से एक तलवार बंधी हुई थी रामप्रसाद ने अकेले ही 8 हाथी तथा अनेक घोड़ों को मार गिराया।

अकबर रामप्रसाद से काफी प्रभावित हुआ वह उसे बंदी बनाना चाहता था।

अकबर के सैनिकों ने 12 हाथियों की मदद से रामप्रसाद को घेरकर बंदी बना लिया तथा उसे अपने साथ ले गए।

 अकबर ने रामप्रसाद का नाम बदलकर “पीर” रख दिया रामप्रसाद ने अपने मालीक से बिछड़ने के गम में खाना पीना सब कुछ छोड़ दिया।

 अकबर के सैनिक उसके सामने खाने की भिन्न-भिन्न सामग्री लाते थे लेकिन वे उनकी तरफ देखता भी नहीं था।

28 दिन बाद रामप्रसाद ने भूख प्यास से तड़पकर अपने प्राण त्याग दिए।

महाराणा प्रताप का जंगल में वास

महाराणा प्रताप का जीवन काफी कठिनाईयों से भरा था

जब महाराणा प्रताप जंगलों में रहते थे। तब उन्होंने अपनी सेना में भील जाती के लोगों को शामिल किया। उनको अस्त्र तथा शस्त्र की पूरी ट्रेनिंग दी।

 महाराणा प्रताप की हाइट 7.5 फीट थी। उनके कवच का वजन 70 किलो, जूतों का वजन 10 किलो, तलवार का वजन 10 किलो तथा भाले का वजन 80 किलो था।

महाराणा प्रताप साधारण जीने वाले इंसान थे वे पेड़ के पत्तों पर खाना खाते थे उबली हुई सब्जी खाते थे तथा जमीन पर सोते थे।

दिवेर का युद्ध (अक्टूबर 1582)

महाराणा प्रताप ने मेवाड़ की भूमि को मुक्त कराने का अभियान दिवेर से प्रारंभ किया। दिवेर वर्तमान में राजसमंद जिले में उदयपुर-अजमेर मार्ग पर स्थित है।

यह मेवाड़ तथा मुगल सैनिकों के मध्य में निर्णायक युद्ध साबित हुआ।

महाराणा प्रताप को यश तथा विजय प्राप्त हुई दिवेश की जीत के बाद महाराणा प्रताप की ख्याति चारों ओर फैल गई।

थोड़े समय में महाराणा प्रताप ने मुगलों से अपने अधिकार क्षेत्र छीन लिए। वे केवल चित्तौड़गढ़ और मांडलगढ़ को मुगलों से आजाद नहीं करा पाए।

महाराणा प्रताप की मृत्यु

महाराणा प्रताप ने 1585 में अपने जीवन का आरंभ “चावंड” नमक स्थान से किया। उन्होंने चावंड को मेवाड़ की राजधानी बनाया।

महाराणा प्रताप ने अपने जीवन के अंतिम 12 वर्ष चावंड में ही व्यतीत किए।

19 जनवरी 1597 को महाराणा प्रताप धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाते हुए घायल हो जाने के कारण देहांत हो गया।

चावंड से कुछ दूरी पर स्थित बंदोली गांव के निकट महाराणा प्रताप का अंतिम संस्कार हुआ। जहां उनकी छतरी बनी हुई है।

 रामप्रसाद की मौत पर अकबर ने कहा कि “जिस महाराणा प्रताप के हाथी ने मेरे सामने सर नहीं छुपाया, उस महाराणा प्रताप का सर मैं कैसे झुकवा सकता हूं”

इसके बाद महाराणा प्रताप का बड़ा पुत्र अमर सिंह ने मेवाड़ का राजपाट संभाला लेकिन वह मुगलों के विरोध को ज्यादा समय तक नहीं संभाल पाया और 1615 में मुगल शासक जहांगीर के साथ उसने मेवाड़-मुगल संधि स्थापित की।

तो यह थी महाराणा प्रताप की जीवनी हिंदी में हमें उम्मीद है कि आपको महाराणा प्रताप की वीर गाथा पसंद आयी होगी उन्होंने जिंदगी भर मुगलो के सामने घुटने नहीं टेके।

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